अमेरिका के पहले राष्ट्रपति | The first president of America

 अमेरिका के पहले राष्ट्रपति कौन थे 



अमेरिका एक विकसित और शक्तिशाली देश है। इसमें कोई शक नहीं की यह पूरी दुनिया पर किसी न किसी फील्ड में राज करता है और आए दिन हर किसी को चुनौती देता रहता है। लेकिन यह पहले ऐसा नहीं था यह भी किसी दूसरे देश की गुलामी कर चूका है। लेकिन दूसरे देश की तरह इस देश में भी क्रन्तिकारी लोग हुवे और क्रन्तिकारी आयी जिससे यह गुलामी की चुंगल से आज़ाद हुआ। फिर यह देश पीछे मुड़ के नहीं देखा और प्रगति के नई मिसाल कायम करते गया। फिर यहां चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई ताकि एक नेता मिले जो देश के विकास के लिए अच्छे विचार करे और देश की उन्नति करे। फिर यहां प्रेजिडेंट के लिए चुनाव हुवा जिसके पहले प्रेसिडेंट बने George Washington .
इनका जन्म सन्न 1732 में हुवा था। इन्होने सैन्य कला और पश्चिमी विस्तार का अनुसरण किया। 1759 में अमेरिकी क्रांति के प्रकोप तक इन्होने माउंट वर्नोन के आसपास अपनी भूमिका का प्रबंध किया और वर्जिनिआ हाउस ऑफ़ वर्गेसिस में सेवा की। इन्होने एक विधवा से शादी की और खुद को एक व्यस्त और सुखी जीवन के लिए समर्पित कर दिया। 
1775 में फिलाडेल्फिया में महाद्वीपीय कांग्रेस इकट्ठी हुई जिसमे वर्जीनिया के प्रतिनिधियों में से एक इनको महाद्वीप सेना का कमांडर इन चीफ चुना गया। 3 जुलाई 1775 को इन्होने अपने ख़राब प्रशिक्षित सैनिकों की कमान संभाली और एक युद्ध शुरू किया जो छः वर्षो तक चला। यह बहुत जल्द ही समझ गए की इनको अंग्रेज़ों के खिलाफ कैसे काम करना है। इन्होने कांग्रेस को सुचना दी "हमें सभी अवसरों पर एक सामान्य कार्यवाही से बचना चाहिए या जोखिम के लिए कुछ भी रखना चाहिए, जब तक की एक आवश्यकता से मज़बूर न हो, जिसमे हमें कभी भी आकर्षित नहीं होना चाहिए।" इस तरह यह बहुत से लड़ाई लड़ते गए और जीतते गए। आखिर में 1781 में फ्रांस की सहायता से इन्होने यार्क टाउन में कार्नवालिस को आत्मसमर्पण के लिए मज़बूर किया। 
इसके बाद यह इन सब से दूर अपनी आज़ाद ज़िन्दगी जीना चाहते थे।  लेकिन इन्होने देखा की कॉन्फ़ेडरेशन के अपने लेखो के तहत राष्ट्र अच्छी तरह से काम नहीं कर पा रहा था, इसलिए यह 1787 में फिलाडेल्फिया में संवैधानिक सम्मलेन के लिए अग्रणीम कदम उठाये। नए संविधान के पुष्टि के बाद इनको राष्ट्रपति घोषित किया गया।  
इन्होने देश हित के लिए अच्छा काम किया और कभी भी अपने पद का दुरूपयोग नहीं किया। राजनीती से थके हुवे, बुढ़ापा महसूस करते हुए अपने पद से विदा ले लिए। अपने विदाई भाषण में, इन्होने अपने देशवाशियों से अत्यधिक पार्टी भावना और भौगोलिक भेदों को त्यागने का आग्रह किया। विदेशी मामले में इन्होने दीर्घकालिक गठजोड़ के खिलाफ आवाज़ उठाई। 
सन्न 14 दिसंबर 1799 को गले के संक्रमण से इनकी मृत्यु हो गयी। 

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